Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/584

एष स्य धारया सुतोऽव्यो वारेभिः पवते मदिन्तमः। क्रीडन्नूर्मिरपामिव॥५८४

Veda : Samveda | Mantra No : 584

In Hindi:

ऋषि : ऊरुराङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : ककुप् | स्वर : मध्यमः

विषय : अगले मन्त्र में सोम का धाराप्रवाह वर्णित है।

पदपाठ : एषः। स्यः। धारया। सुतः। अव्याः। वारेभिः। पवते। मदिन्तमः। क्रीडन्। ऊर्मिः। अपाम्।इव। ७।

पदार्थ : प्रथम—सोम ओषधि के रस के पक्ष में। (एषः) यह (स्यः) वह हमारे द्वारा पर्वत से लाया गया, (अव्याः वारेभिः) भेड़ के बालों से अर्थात् भेड़ की ऊन से निर्मित दशापवित्रों से (सुतः) अभिषुत किया गया, (मदिन्तमः) अतिशय आनन्द उत्पन्न करनेवाला सोमरस (अपाम्) नदियों की (ऊर्मिः इव) लहर के समान (क्रीडन्) क्रीडा करता हुआ (धारया) धारा रूप से (पवते) द्रोणकलश में जा रहा है ॥द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (एषः) यह अनुभव किया जाता हुआ (स्यः) वह (अव्याः वारेभिः) भेड़ के बालों से निर्मित दशापवित्रों के तुल्य पवित्रताकारक यम, नियम आदि योगाङ्गों से (सुतः) हृदय में प्रकट किया गया, (मदिन्तमः) अतिशय आनन्द उत्पन्न करनेवाला सोम परमात्मा (अपाम् ऊर्मिः इव) नदियों की लहर के समान (कीडन्) क्रीडा करता हुआ (धारया) आनन्द की धारा के साथ (पवते) मेरे आत्मा में पहुँच रहा है ॥७॥इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार है। जलों की लहर के समान क्रीडा करता हुआ सोम ओषधि का रस जैसे दशापवित्रों से छाना हुआ द्रोणकलश में पहुँचता है, वैसे ही यम, नियम आदि योग-साधनों से हृदय में प्रकट किया गया परमात्मारूप सोम मानो क्रीडा करता हुआ आनन्दप्रवाह के साथ योगियों के आत्मा को प्राप्त होता है ॥७॥

भावार्थ : समाधिस्थ उपासक लोग परमात्मा के पास से अपने आत्मा में वेगपूर्वक आती हुई आनन्दधारा को साक्षात् अनुभव करते हैं ॥७॥