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Samveda/585

य उस्रिया अपि या अन्तरश्मनि निर्गा अकृन्तदोजसा। अभि व्रजं तत्निषे गव्यमश्व्यं वर्मीव धृष्णवा रुज। ओ३म् वर्मीव धृष्णवा रुज॥५८५

Veda : Samveda | Mantra No : 585

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वा भारद्वाजः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : ककुप् | स्वर : मध्यमः

विषय : अगले मन्त्र में सोम परमेश्वर का वर्णन किया गया है।

पदपाठ : एषः। स्यः। धारया। सुतः। अव्याः। वारेभिः। पवते। मदिन्तमः। क्रीडन्। ऊर्मिः। अपाम्।इव। ७।

पदार्थ : (उस्रियाः अपि) निकलने योग्य होती हुई भी (याः) जो (अश्मनि अन्तः) मेघ के अन्दर रुक जाती हैं, उन (गाः) सूर्य-किरणों को (यः) जो आप (ओजसा) अपने प्रताप से (निर् अकृन्तत्) मेघ के बाहर निकाल देते हो, वह आप (गव्यम्) भूमि-सम्बन्धी और (अश्व्यम्) सूर्यसम्बन्धी (व्रजम्) मण्डल को (अभितत्निषे) चारों ओर विस्तीर्ण करते हो। हे (धृष्णो) विपत्तियों का धर्षण करनेवाले परमात्मन् ! आप (वर्मी इव) कवचधारी योद्धा के समान (आरुज) हमारी विपदाओं को और हमारे शत्रुओं को भग्न कर दो ॥८॥इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘उस्रियाः अपि याः अन्तरश्मनि’ का यदि यह अर्थ करें कि ‘जो बहती हुई भी पत्थर के अन्दर रुकी हुई हैं’ तो विरोध प्रतीत होता है, ‘बहने के योग्य होती हुई भी मेघ में निरुद्ध’ इस अर्थ से विरोध का परिहार हो जाता है। अतः विरोधाभास अलङ्कार है ॥८॥

भावार्थ : जैसे परमेश्वर मध्य में स्थित मेघ की बाधा को विच्छिन्न करके सूर्यकिरणों को भूमि पर प्रसारित कर देता है, वैसे ही जीवात्मा योगमार्ग में आये सब विघ्नों का विदारण कर सफलता प्राप्त करे ॥८॥इस दशति में भी सोम नाम से परमात्मा का और उसके आनन्दरस का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥षष्ठ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥पञ्चम अध्याय में एकादश खण्ड समाप्त ॥पञ्चम अध्याय समाप्त ॥