Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/612

इन्द्रस्य नु वीक्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री। अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम्॥६१२

Veda : Samveda | Mantra No : 612

In Hindi:

ऋषि : हरिण्यस्तूप आंगिरसः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र का देवता इन्द्र है। इन्द्र नाम से परमात्मा, राजा आदि के पराक्रमों का वर्णन है।

पदपाठ : इन्द्रस्यनु। वीर्याणि। प्र।वोचम्। यानि। चकार। प्रथमानि। वज्री। अहन्। अहिम्।अनु।अपः। ततर्द। प्र। वक्षणाः। अभिनत्। पर्वतानाम्। ११।

पदार्थ : प्रथम—परमात्मा, सूर्य और विद्युत् के पक्ष में। मैं (इन्द्रस्य) वीर परमात्मा, पदार्थों को अवयव रूप में विछिन्न करनेवाले सूर्य और परमैश्वर्य की साधनभूत विद्युत् के (नु) शीघ्र (वीर्याणि) क्रमशः सृष्टि के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप, आकर्षण-प्रकाशन आदि रूप और भूयान, जलयान, अन्तरिक्षयान तथा विविध यन्त्रों के चलाने रूप वीरता के कर्मों का (प्र वोचम्) वर्णन करता हूँ, (यानि प्रथमानि) जिन उत्कृष्ट कर्मों को, वह (वज्री) शक्तिधारी (चकार) करता है। उन्हीं वीरता के कर्मों में से एक का कथन करते हैं—वह परमात्मा, वह सूर्य और वह विद्युत् (अहिम्) अन्तरिक्ष में स्थित बादल का (अहन्) संहार करता है, (अपः) बादल में स्थित जलों को (अनु ततर्द) तोड़-तोड़कर नीचे गिराता है, (पर्वतानाम्) पहाड़ों की (वक्षणाः) नदियों को (प्र अभिनत्) बर्फ तोड़-तोड़कर प्रवाहित करता है ॥द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। मैं (इन्द्रस्य) शत्रुविदारक राजा के (नु) शीघ्र ही (वीर्याणि) शत्रुविजय, राष्ट्रनिर्माण आदि वीरतापूर्ण कर्मों को (प्र वोचम्) भली-भाँति वर्णित करता हूँ, (यानि प्रथमानि) जिन श्रेष्ठ कर्मों को (वज्री) तलवार, बन्दूक, तोप, गोले आदि शस्त्रास्त्रों से युक्त वह (चकार) करता है। वह (अहिम्) साँप के समान टेढ़ी चालवाले, विषधर, राष्ट्र की उन्नति में बाधक शत्रु का (अहन्) संहार करता है, (अपः) जलों के समान उमड़नेवाले शत्रु-दलों को (ततर्द) छीलता है, (पर्वतानाम्) किलों की (वक्षणाः) सेनाओं को (अभिनत्) छिन्न-भिन्न करता है ॥११॥इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। अहन्, अनुततर्द, प्राभिनत् इन अनेक क्रियाओं में एक कारक का योग होने से दीपकालङ्कार भी है ॥११॥

भावार्थ : जैसे परमेश्वर सूर्य द्वारा अथवा आकाशीय बिजली द्वारा मेघ का संहार कर रुके हुए जलों को नीचे बरसाता और नदियों को बहाता है, वैसे ही राष्ट्र का राजा विघ्नकारी शत्रुओं को मार कर, किलों में भी स्थित सेनाओं को हरा कर राष्ट्र में सब ऐश्वर्यों को प्रवाहित करे ॥११॥