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Samveda/613

अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म आसन्। त्रिधातुरर्को रजसो विमानोऽजस्रं ज्योतिर्हविरस्मि सर्वम्॥६१३

Veda : Samveda | Mantra No : 613

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रो गाथिनः | देवता : आत्मा अग्निर्वा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले दो मन्त्रों का अग्नि देवता है। इस मन्त्र में परमात्मा और जीवात्मा अपना परिचय दे रहे हैं।

पदपाठ : अग्निः। अस्मि। जन्मना। जातवेदाः।जात।वेदाः। घृतम्। मे। चक्षुः। अमृतम्।अ। मृतम्।मे। आसन्। त्रिधातुः।त्रि।धातुः।अर्कः। रजसः। विमानः।वि।मानः। अजस्रम्।अ।जस्रम्।। ज्योतिः। हविः।अस्मि। सर्वम्।१२।

पदार्थ : प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। मैं परमात्मा (अग्निः अस्मि) सबका अग्रनायक और अग्नि के समान प्रकाशक होने से अग्नि नामवाला हूँ, (जन्मना) स्वरूप से ही (जातवेदाः) सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, वेदों का प्रकाशक तथा सब धनों का उत्पादक हूँ। (मे) मेरी (चक्षुः) आँख अर्थात् देखने की शक्ति (घृतम्) अत्यन्त तीव्र है। (मे) मेरे (आसन्) मुख में (अमृतम्) अमृत है, मैं सदा अमृतत्व का आस्वादन करता रहता हूँ अर्थात् अमर हूँ। मैं (त्रिधातुः) जगत् की सृष्टि, स्थिति तथा संहार रूप तीनों क्रियाओं को करनेवाला हूँ, मैं (अर्कः) अर्चनीय हूँ। मैं (रजसः) सूर्य, चन्द्र, तारे, पृथिवी आदि लोकों का (विमानः) निर्माता अथवा अधिष्ठाता, (अजस्रं ज्योतिः) अक्षय तेजवाला, (हविः) सबका आह्वानयोग्य, और (सर्वम्) सर्वशक्तिमान् (अस्मि) हूँ ॥यहाँ ‘मैं अमर हूँ’ इस व्यङ्ग्यार्थ को ही ‘मेरे मुख में अमृत है’ इस रूप में अभिहित करने से पर्यायोक्त अलङ्कार है ॥द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में । शरीरधारी जीवात्मा कह रहा है—मैं (अग्निः अस्मि) आग हूँ, आग के समान प्रकाशक तथा दुर्गुणों और दुर्जनों को भस्म करनेवाला हूँ, (जन्मना) आचार्य के गर्भ से द्वितीय जन्म पाने के आरम्भ से ही (जातवेदाः) वेदविद्या का विद्वान् हूँ। (मे चक्षुः) मेरी आँख में (घृतम्) स्नेह है, अर्थात् मैं सबको स्नेहयुक्त आँख से देखता हूँ। (मे आसन्) मेरे मुख में (अमृतम्) अमृत अर्थात् वाणी का माधुर्य है। मैं (त्रिधातुः) सत्त्व-रजस्-तमस्, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, तप-स्वाध्याय-ईश्वरप्रणिधान, ऋग्-यजुः-साम आदि त्रिगणों से युक्त हूँ। मैं (अर्कः) परमेश्वर की अर्चना करनेवाला, सदाचारी तथा विद्यावृद्धों एवं वयोवृद्धों का सत्कार करनेवाला और सूर्य के समान तेजस्वी हूँ। मैं (रजसः) ग्रह-उपग्रह, सूर्य आदि लोकों को (विमानः) खगोल-गणित द्वारा मापने आदि में समर्थ, (अजस्रं ज्योतिः) अक्षय ज्योतिवाला और (सर्वं हविः) श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए सर्वस्व बलिदान कर देनेवाला (अस्मि) हूँ ॥१२॥इस मन्त्र में ‘अग्निः अस्मि, अर्कः अस्मि’, ‘मैं आग हूँ, मैं सूर्य हूँ’ इस अर्थ में रूपकालङ्कार है। ‘अजस्रं ज्योतिः’ की ‘अजस्र ज्योतिवाले’ में और ‘सर्वं हविः’ की ‘सर्वस्व हवि देनेवाले’ में लक्षणा है। निरुक्तप्रोक्त त्रिविध ऋचाओं परोक्षकृत, प्रत्यक्षकृत तथा आध्यात्मिक में से यह ऋचा आध्यात्मिक है ॥१२॥

भावार्थ : परमेश्वर के समान मनुष्य का आत्मा भी बहुत-से विशिष्ट गुणोंवाला तथा महाशक्ति-सम्पन्न है। अतः उसे चाहिए कि महत्त्वाकांक्षी होकर महान् कर्मों में कदम रखे ॥१२॥