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Samveda/700

अभि प्रियाणि पवते चनोहितो नामानि यह्वो अधि येषु वर्धते। आ सूर्यस्य बृहतो बृहन्नधि रथं विष्वञ्चमरुहद्विचक्षणः।।॥७००

Veda : Samveda | Mantra No : 700

In Hindi:

ऋषि : कविर्भार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ५५४ पर परमेश्वर के विषय में की गयी थी। यहाँ जीवात्मा का विषय है।

पदपाठ : अभि । प्रियाणि । पवते । चनोहितः । चनः । हितः । नामानि । यह्व । अधि । येषु । वर्धते । आ । सूर्यस्य । बृहतः । बृहन् । अधि । रथम् । विष्वञ्चम् । वि । स्वञ्चम् । अरुहत् । विचक्षणः ॥

पदार्थ : (चनोहितः) भोगों को भोगने के लिए शरीर में प्रेषित, (यह्वः) महाशक्तिशाली जीवात्मा (प्रियाणि) प्रिय (नामानि) लचकीले अङ्गों में (पवते) जाता है, (येषु अधि) जिनमें, यह (वर्धते) महिमा को प्राप्त करता है। (बृहन्) महान् (विचक्षणः) ज्ञानवान् यह जीवात्मा (बृहतः) महान् (सूर्यस्य) गतिमय प्राण के (वि-स्वञ्चम्) विशिष्ट शुभगतिवाले (रथम् अधि) देहस्य रथ पर (आ अरुहत्) चढ़कर बैठा हुआ है ॥१॥

भावार्थ : आत्मा कर्मफल-भोग के लिए प्राणयुक्त देह का आश्रय लेकर शुभाशुभ भोगों को भोगता है ॥१॥