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Samveda/701

ऋतस्य जिह्वा पवते मधु प्रियं वक्ता पतिर्धियो अस्या अदाभ्यः। दधाति पुत्रः पित्रोरपीच्यांऽ. नाम तृतीयमधि रोचनं दिवः॥७०१

Veda : Samveda | Mantra No : 701

In Hindi:

ऋषि : कविर्भार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में ईश्वररचित वेदों से उपासक क्या फल प्राप्त करता है, यह वर्णित है।

पदपाठ : वि । चक्षणः । ऋतस्य । जिह्वा । पवते । मधु । प्रियम् । वक्ता । पतिः । धिय । अस्याः । अदाभ्य । अ । दाभ्यः । दधाति । पुत्रः । पुत् । त्रः । पित्रोः । अपीच्यम् । नाम । तृतीयम् । अधि । रोचनम् । दिवः ॥

पदार्थ : (ऋतस्य) सत्यस्वरूप जगदीश्वर की (जिह्वा) वेदवाणी (प्रियम्) प्रिय (मधु) अध्यात्मज्ञानरूप मधु को (पवते) बहा रही है। (अस्याः धियः) इस ज्ञानमयी वेदवाणी का (वक्ता) वक्ता (पतिः) जगत्पति परमेश्वर (अदाभ्यः) अजर-अमर है। इस वेदवाणी के माध्यम से (पुत्रः) अमृतमय परमात्मा का पुत्र उपासक (पित्रोः) माता-पिता से भी (अपीच्यम्) छिपे हुए, (दिवः रोचनम्) जीवात्मा को प्रकाशित करनेवाले (तृतीयं नाम) तृतीय पद ओंकार को (अभिदधाति) हृदय में धारण कर लेता है। कहा भी है-“तत्त्वदर्शी विद्वान् लोग विष्णु परमात्मा के उस परमपद का वैसे ही स्वाभाविक रूप से दर्शन करते हैं, जैसे सूर्यप्रकाश में आँख पदार्थों को देखती है'' (य० ६।५) ॥२॥

भावार्थ : प्रकृति, जीवात्मा और ओंकार ये तीन पद हैं। ईश्वररचित वेदों का रहस्यार्थ जानकर मनुष्य अपने माता-पिता से भी अधिक ज्ञानी होकर ओंकार-रूप परमपद को प्राप्त करने योग्य हो जाता है ॥२॥