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Samveda/706

यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम्। तत्र योनिं कृणवसे॥७०६

Veda : Samveda | Mantra No : 706

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : यत्र । क । च । ते । मनः । दक्षम् । दधसे । उत्तरम् । तत्र । योनिम् । कृणवसे ॥

पदार्थ : हे विद्यार्थिन् ! (यत्र क्व च) जिस किसी भी विज्ञान में (ते मनः) तेरा मन है, अर्थात् तेरी रुचि है, उसमें (उत्तरम्) अधिकाधिक (दक्षम्) बल को, निपुणता को (दधसे) धारण कर और (तत्र)उस विज्ञान में (योनिम्) घर (कृणवसे) कर ले, अर्थात् उस विद्या में पारंगत हो जा ॥२॥

भावार्थ : जिन भी विद्याओं में शिष्यों की रुचि तथा ग्रहणशक्ति हो, उन विद्याओं में गुरुजन उन्हें निष्णात करें ॥२॥