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Samveda/737

इदह्यन्वोजसा सुतराधानां पते। पिबा त्वास्य गिर्वणः॥७३७

Veda : Samveda | Mantra No : 737

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रो गाथिनः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क १६५ पर परमात्मा के विषय में की गयी थी। यहाँ अपने अन्तरात्मा को सम्बोधन है।

पदपाठ : इदम् ।हि ।अनु ।ओजसा ।सुतम् ।राधानाम् ।पते ।पिब ।तु ।अस्य ।गिर्वणः ।गिः ।वनः ॥

पदार्थ : हे (राधानां पते) सदिच्छा, महत्वाकांक्षा, सत्प्रयत्न, सुख, ज्ञान आदि के स्वामी मेरे अन्तरात्मन् ! (इदं हि) यह ब्रह्मानन्द-रस (ओजसा) बल और वेग के साथ (अनु सुतम्) अनुकूल रूप में अभिषुत हुआ है। हे (गिर्वणः) वाणियों से प्रभुभक्ति में संलग्न आत्मन् ! तू (अस्य) इस ब्रह्मानन्दरूप सोमरस को (तु) शीघ्र (पिब) पान कर ले ॥१॥

भावार्थ : योग का अनुष्ठान करने से ब्रह्मानन्द के रस की धारा जब आत्मा को व्याप लेती है, तब योगी कृतकृत्य हो जाता है ॥१॥