Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/738

यस्ते अनु स्वधामसत्सुते नि यच्छ तन्वम्। स त्वा ममत्तु सोम्य॥७३८

Veda : Samveda | Mantra No : 738

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रो गाथिनः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः आत्मा को सम्बोधन है।

पदपाठ : यः ।ते ।अनु ।स्वधाम् ।स्व ।धाम् ।असत् ।सुते ।नि ।यच्छ ।तन्वम् ।सः ।त्वा ।ममत्तु ।सोम्य ॥

पदार्थ : हे मेरे अन्तरात्मन् ! (यः) जो ब्रह्मानन्दरस (ते) तेरी (स्वधाम् अनु) आनन्द-भोगेच्छा के अनुकूल (असत्) उत्पन्न हुआ है,उस ब्रह्मानन्द-रूप सोमरस के (सुते) अनुभव में आने पर, तू (तन्वम्) अपने शरीर को (नियच्छ) यम-नियम की रस्सियों से नियन्त्रित करते हुए चल। हे (सोम्य) सौम्य आत्मन् ! (सः) वह ब्रह्मानन्द-रस (त्वा) तुझे (ममत्तु) हर्षित एवं तरङ्गित कर दे ॥२॥

भावार्थ : उपासना से जब ब्रह्मानन्द-रस आत्मा को प्राप्त होता है, तब शरीर के तथा मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि के भी सब व्यवहार सात्त्विक हो जाते हैं ॥२॥