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Samveda/764

प्र सोमासो विपश्चितोऽपो नयन्त ऊर्मयः। वनानि महिषा इव॥७६४

Veda : Samveda | Mantra No : 764

In Hindi:

ऋषि : त्रित आप्तयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या क्रमाङ्क ४७८ पर ब्रह्मानन्द-रस के विषय में की जा चुकी है। यहाँ विद्वान् का विषय वर्णित करते हैं ॥

पदपाठ : प्र। सोमासः ।विपश्चितः ।विपः ।चितः ।अपः ।नयन्ते ।ऊर्मयः ।बनानि ।महिषाः ।इव॥

पदार्थ : (विपश्चितः) विद्वान्, (ऊर्मयः) पढ़ायी हुई विद्याओं से शिष्य के हृदय को आच्छादित करनेवाले अथवा क्रियाशील, (सोमासः) शिष्यों को द्वितीय जन्म देनेवाले आचार्य लोग (अपः) शिष्यों के कर्म को (प्र नयन्त) उत्कृष्ट दिशा में ले जाते हैं, (इव) जैसे (महिषाः) महान् सूर्यकिरणें (वनानि) जलों को, बादल बनाने के लिए (प्र नयन्त) ऊपर अन्तरिक्ष में ले जाती हैं ॥१॥इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जैसे विद्वान् गुरुजन ज्ञान-दान तथा आचार-निर्माण के द्वारा विद्यार्थियों का उपकार करते हैं, वैसे ही विद्यार्थियों को भी चाहिए कि मन, वचन और कर्म से उनका सत्कार करें ॥१॥