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Samveda/827

इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः। रथीतम रथीनां वाजाना सत्पतिं पतिम्॥८२७

Veda : Samveda | Mantra No : 827

In Hindi:

ऋषि : जेता माधुच्छन्दसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : प्रथम ऋचा का पूर्वार्चिक में ३४३ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में भाष्य किया गया था। यहाँ जगदीश्वर और आचार्य का विषय वर्णित है।

पदपाठ : इन्द्रम् ।विश्वाः ।अवीवृधन ।समुद्रव्यचसम् ।समुद्र ।व्यचसम् ।गिरः ।रथीतमम् ।रथीनाम् ।वाजानाम् ।सत्पतिम् ।सत् ।पतिम् ।पतिम्॥

पदार्थ : (विश्वाः) सब (गिरः) वाणियाँ (समुद्रव्यचसम्) समुद्र या अन्तरिक्ष के समान विशाल अर्थात् उदारहृदय, (रथीनाम्) रथस्वामियों के मध्य (रथीतमम्) श्रेष्ठ रथस्वामी, (वाजानाम्) आत्मबलों और विद्याबलों के (पतिम्) अधीश्वर, (सत्पतिम्) श्रेष्ठ मनुष्यों वा श्रेष्ठ विद्यार्थियों के पालनकर्त्ता (इन्द्रम्) जगदीश्वर वा विद्वान् आचार्य को (अवीवृधन्) महिमा से बढ़ाती हैं ॥१॥‘समुद्रव्यचसम् इन्द्रम्’ में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जैसे जगदीश्वर ब्रह्माण्डरूप रथ का श्रेष्ठ स्वामी है, वैसे ही आचार्य गुरुकुलरूप रथ का श्रेष्ठ कुलपति होता है ॥१॥