Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/838

अतस्त्वा रयिरभ्ययद्राजान सुक्रतो दिवः। सुपर्णो अव्यथी भरत्॥८३८

Veda : Samveda | Mantra No : 838

In Hindi:

ऋषि : कविर्भार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा और चन्द्रमा का विषय वर्णित है।

पदपाठ : अतः ।त्वा। रयिः। अभि ।अयत् ।राजानाम् ।सुक्रतो ।सु ।क्रतो ।दिवः ।सुपर्णाः ।सु ।पर्णः ।अव्यथी ।अ ।व्यथी ।भरत्॥

पदार्थ : प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (सुक्रतो) शुभ कर्म करनेवाले मनुष्य ! (राजानं त्वा) यश से जगमगानेवाले तुझे (दिवः) देदीप्यमान (अतः) इस पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्त्ता जगदुत्पादक परमेश्वर से ही (रयिः) ऐश्वर्य (अभ्ययत्) प्राप्त हुआ है, जिस ऐश्वर्य को (सुपर्णः) शुभ पालनकर्त्ता, (अव्यथी) किसी प्रकार की व्यथा से रहित उस परमेश्वर ने तेरे लिए (भरत्) दिया है ॥द्वितीय—चन्द्रमा के पक्ष में। हे पवमान सोम अर्थात् गति करनेवाले चन्द्रमा ! (राजानं त्वा) दीप्तिमान् तुझे (अतः दिवः) इस सूर्यलोक से ही (रयिः) प्रकाशरूप धन (अभ्ययत्) मिलता है, जिसे (सुपर्णः) सुन्दर किरणोंवाला (अव्यथी) अविचल स्थिर सूर्य (भरत्) तेरे अन्दर लाता है ॥३॥यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥

भावार्थ : जैसे मनुष्य जगदीश्वर से सब प्रकार का धन प्राप्त करता है, वैसे ही चन्द्रमा सूर्य से दीप्ति पाता है ॥३॥