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Samveda/839

अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे। अभिष्टिकृद्विचर्षणिः॥८३९

Veda : Samveda | Mantra No : 839

In Hindi:

ऋषि : कविर्भार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा का विषय है।

पदपाठ : अध ।हिन्वानः ।इन्द्रियम् ।ज्यायः ।महित्वम् ।आनशे ।अभिष्टिकृत् ।अभिष्टि ।कृत ।विचर्षणिः।वि ।चर्षणिः॥

पदार्थ : (अध) और यह बात भी है कि वह पवमान सोम अर्थात् पवित्रता देनेवाला जगत्स्रष्टा परमात्मा (इन्द्रियम्) आँख आदि इन्द्रिय को अथवा आत्मबल को (हिन्वानः) प्रेरित करता हुआ (ज्यायः) अत्यन्त प्रशस्त (महित्वम्) महत्त्व को (आनशे) प्राप्त करता है। वही (अभिष्टिकृत्) अभीष्ट प्रदाता और (विचर्षणिः) विशेषरूप से सबका साक्षात् द्रष्टा है ॥४॥

भावार्थ : जो मन, आँख, कान आदि में मनन करने, देखने, सुनने आदि के सामर्थ्य को तथा आत्मा में बल को निहित करता है, उस कामना पूर्ण करनेवाले, विश्वद्रष्टा परमात्मा का महत्त्व सबको जानना चाहिए ॥४॥