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Samveda/850

इन्द्रेण सहि दृक्षसे सजग्मानो अबिभ्युषा। मन्दू समानवर्च्चसा॥८५०

Veda : Samveda | Mantra No : 850

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम मन्त्र में जीवात्मा और प्राण का विषय है।

पदपाठ : इन्द्रेण ।सम् ।हि ।दृक्षसे ।संजग्मानः ।सम् ।जग्मानः ।अबिभ्युषा ।अ ।बिभ्युषा ।मन्दू इति ।समानवर्चसा। समान। वर्चसा॥

पदार्थ : हे मरुतों के गण अर्थात् प्राण-गण ! तू (अबिभ्युषा) निर्भय (इन्द्रेण) जीवात्मा के साथ (संजग्मानः) सङ्गत होता हुआ (संदृक्षसे) दिखायी देता है। तुम दोनों अर्थात् प्राण-गण और जीवात्मा (मन्दू) आनन्द देनेवाले, तथा (समानवर्चसा) तुल्य तेजवाले हो ॥१॥

भावार्थ : शरीर में जीवात्मा और प्राण दोनों का समान महत्त्व है। प्राण के बिना जीवात्मा और जीवात्मा के बिना प्राण कुछ नहीं कर सकता ॥१॥