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Samveda/849

कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया। दक्षं दधाते अपसम् (व)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥८४९

Veda : Samveda | Mantra No : 849

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः ब्रह्म-क्षत्र का ही विषय है।

पदपाठ : कवीइति। नः। मित्रा। मि ।त्रा ।वरुणा ।तुविजातौ ।तुवि ।जातौ ।उरुक्षया ।उरु। क्षया ।दक्षम् ।दधातेइति ।अपसम्॥

पदार्थ : (कवी) क्रान्तद्रष्टा, बुद्धिमान् (तुविजाता) बहुत प्रसिद्ध, (उरुक्षया) विशाल निवास को देनेवाले (मित्रावरुणा) ब्राह्मण-क्षत्रिय (नः) हमारे (दक्षम्) बल को, तथा (अपसम्) कर्म को (दधाते) पुष्ट करते हैं ॥३॥

भावार्थ : राष्ट्रवासियों का बल, कर्म और सुरक्षित निवास ब्रह्म-क्षत्र के समन्वय से ही भली-भाँति सिद्ध होता है ॥३॥