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Samveda/859

तिस्रो वाच ईरयति प्र वह्निर्ऋतस्य धीतिं ब्रह्मणो मनीषाम्। गावो यन्ति गोपतिं पृच्छमानाः सोमं यन्ति मतयो वावशानाः॥८५९

Veda : Samveda | Mantra No : 859

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्त्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५२५ क्रमाङ्क पर परमात्मा, जीवात्मा और आचार्य के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ महाकवि के कर्म का वर्णन किया जाता है।

पदपाठ : तिस्रः ।वाचः ।ईरयति ।प्र ।वह्नि ।ऋतस्य ।धीतिम् ।ब्रह्मणः ।मनीषाम् ।गावः ।यन्ति ।गोपतिम् ।गो ।पतिम् ।पृच्छमानाः ।सोमम् ।यन्ति ।मतयः ।वावशानाः॥

पदार्थ : (वह्निः) काव्य का वाहक महाकवि (तिस्रः) गद्य, पद्य एवं उभयात्मक अथवा अभिधात्मक, लक्षणात्मक एवं व्यञ्जनात्मक, (वाचः) वाणियों को (प्र ईरयति) प्रयुक्त करता है। वह अपने काव्य में (ऋतस्य) सत्य के (धीतिम्) धारण को और (ब्रह्मणः) परमात्मा की (मनीषाम्) स्तुति को भी प्रयुक्त करता है। (गावः) वाणियाँ (गोपतिम्) उस वागीश्वर महाकवि के विषय में (पृच्छमानाः) पूछती हुई (यन्ति) जा रही हैं—कहाँ है वह महाकवि जो अपने काव्य में प्रयुक्त करके हमें कृतार्थ करेगा, मानो यह पूछती हैं। (मतयः) स्तुतियाँ भी, मानो (सोमम्) उसी रससिद्ध कवि को (वावशानाः) चाहती हुई, खोजती हुई (यन्ति) जा रही हैं ॥१॥यहाँ उत्तरार्ध में असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : कोई विरले ही रससिद्ध कवि अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जनावाली गद्य, पद्य, उभय रूप वाणी को प्रयुक्त करते हुए सात्त्विक, शान्तरसमय ब्रह्मस्तोत्रों को रचकर अपनी वाणी को कृतकृत्य करते हैं ॥१॥