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Samveda/875

पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः। अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तः सं तदाशत॥८७५

Veda : Samveda | Mantra No : 875

In Hindi:

ऋषि : पवित्र आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५६५ क्रमाङ्क पर परमात्मा के पवित्र करनेवाले गुण के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ परमात्मा और आचार्य का विषय वर्णित है।

पदपाठ : पवित्रम्। ते ।विततम्। वि ।ततम् ।ब्रह्मणः ।पते ।प्रभुः ।प्र ।भुः ।गात्राणि ।परि ।एषि ।विश्वतः ।अतप्ततनूः ।अतप्त ।तनूः ।न ।तत् ।आमः ।अश्नुते ।शृतासः ।इत् ।वहन्तः ।सम् ।तत् ।आशत् ॥

पदार्थ : हे (ब्रह्मणः पते) ब्रह्माण्ड के अधिपति परमात्मन् अथवा ज्ञान के अधिपति आचार्य ! (ते) आपका (पवित्रम्) पवित्र आनन्दतत्त्व या ज्ञानतत्त्व (विततम्) आप में फैला हुआ है। (प्रभुः) आनन्द के देने वा ज्ञान के देने में समर्थ आप (विश्वतः) सब ओर से (गात्राणि) शरीरों अर्थात् शरीरधारियों को उसे देने के लिए (पर्येषि) प्राप्त होते हो। किन्तु (अतप्ततनूः) जिसने शरीर को तपाया नहीं है, अर्थात् जिसने तपस्या नहीं की, ऐसा (आमः) कच्चा मनुष्य (तत्) उस आनन्दतत्त्व या ज्ञानतत्त्व को (न अश्नुते) नहीं प्राप्त करता है। (शृतासः इत्) पके हुए लोग ही (वहन्तः) उद्योगी होते हुए (तत्) उस आनन्दतत्त्व या ज्ञानतत्त्व को (सम् आशत) भली-भाँति प्राप्त करने में समर्थ होते हैं ॥१॥

भावार्थ : परमात्मा के पास से आनन्दरस को और आचार्य के पास से ज्ञानरस को तपस्वी मनुष्य ही प्राप्त करने योग्य होते हैं, विलासी लोग नहीं ॥१॥