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Samveda/874

सहस्रधारः पवते समुद्रो वाचमीङ्खयः। सोमस्पती रयीणासखेन्द्रस्य दिवेदिवे (लि)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. । ]॥८७४

Veda : Samveda | Mantra No : 874

In Hindi:

ऋषि : यथातिर्नाहुषः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा और आचार्य का विषय है।

पदपाठ : सहस्रधारः ।सहस्र ।धारः ।पवते ।समुद्रः ।सम् ।उद्रः ।वाचमिङ्खयः ।वाचम् ।इङ्खयः ।सोमः ।पतिः ।रयीणाम् ।सखा ।स ।खा ।इन्द्रस्य। दिवेदिवे । दिवे । दिवे॥

पदार्थ : (समुद्रः) आनन्द वा ज्ञान का समुद्र, (वाचमीङ्खयः) वाणी को प्रेरित करनेवाला, (रयीणां पतिः) श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाव रूप धनों का स्वामी, (इन्द्रस्य सखा) जीवात्मा का सखा (सोमः) परमात्मा वा आचार्य (दिवे दिवे) प्रतिदिन (सहस्रधारः) हजारों धाराओं से उमड़ता हुआ (पवते) उपासकों वा शिष्यों के प्रति आनन्दरस वा ज्ञानरस को प्रवाहित करता है ॥३॥

भावार्थ : परमेश्वर श्रेष्ठ उपासकों को प्राप्त होकर उनके प्रति मधुर आनन्दरस को और आचार्य श्रेष्ठ शिष्यों को प्राप्त होकर उनके प्रति मधुर ज्ञानरस को प्रवाहित करता है ॥३॥