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Samveda/892

प्र यद्गावो न भूर्णयस्त्वेषा अयासो अक्रमुः। घ्नन्तः कृष्णामप त्वचम्॥८९२

Veda : Samveda | Mantra No : 892

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४९१ क्रमाङ्क पर परमात्मा से उत्पन्न होनेवाले आनन्दरस के विषय में व्याख्यात हुई थी। यहाँ आचार्य से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान का विषय वर्णित है।

पदपाठ : प्र। यत् ।गाथः ।न ।भूर्णयः ।त्वेषाः ।अयाषः ।अक्रमु ।प्रन्त ।कृष्णाम् ।अप ।त्वचम्॥

पदार्थ : (यत्) जब (गावः न) गायों से समान (भूर्णयः) भरण-पोषण करनेवाले, (त्वेषाः) उज्ज्वल, (अयासः) शिष्यों के प्रति जानेवाले ज्ञानरस (प्र अक्रमुः) प्रदान किये जाने आरम्भ होते हैं, तब वे (त्वचम्) ढकनेवाली (कृष्णाम्) अविद्या-रात्रि को (घ्नन्तः) नष्ट कर देते हैं ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जब शिष्य विविध लौकिक विद्याओं और ब्रह्मविद्याओं को प्राप्त कर लेते हैं, तब सारी अविद्यारूप निशाएँ दूर हो जाती हैं ॥१॥