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Samveda/908

त्वामग्ने अङ्गिरसो गुहा हितमन्वविन्दञ्छिश्रियाणं वनेवने। स जायसे मथ्यमानः सहो महत्वामाहुः सहसस्पुत्रमङ्गिरः॥९०८

Veda : Samveda | Mantra No : 908

In Hindi:

ऋषि : सुतंभर आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा की प्राप्ति का विषय है।

पदपाठ : त्वाम् ।अग्ने ।अङ्गिरसः ।गुहा। हितम् ।अनु ।अविन्दन् ।शिश्रिवाणम् ।वनेवने। वने ।वने ।सः ।जायसे ।मध्यमानः ।सहः ।महत्। त्वाम् ।आहुः। सहसः। पुत्रम् ।पुत् ।त्रम् ।अङ्गिरः॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्रनायक परमेश्वर ! (गुहा हितम्) गुहा में निहित अर्थात् गुह्य, (वने वने) प्रत्येक किरण में वा प्रत्येक जीव में (शिश्रियाणम्) विद्यमान (त्वाम्) आपको (अङ्गिरसः) तपस्वी प्राणायामाभ्यासी जन(अन्वविन्दन्) प्राप्त कर लेते हैं। (सः) वह आप (मथ्यमानः) ध्यान किये जाते हुए (महत् सहः) उपासक के महान् बल (जायसे) हो जाते हो। हे (अङ्गिरः) प्राणों के समान प्रिय ! (त्वाम्) आपको (सहसः) बल का (पुत्रम्) पुतला (आहुः) कहते हैं ॥२॥

भावार्थ : परमेश्वर प्रत्येक पदार्थ में विद्यमान होता हुआ भी चर्मचक्षु से दिखायी न देने के कारण गुह्य है। तप और ध्यान से ही वह प्राप्त होने योग्य है। ध्यानी लोग उसके महान् बल और तेज का साक्षात्कार करते हैं ॥२॥