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Samveda/927

पिबा सोममिन्द्र मदन्तु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वाद्रिः। सोतुर्बाहुभ्या सुयतो नार्वा॥९२७

Veda : Samveda | Mantra No : 927

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : विराट् | स्वर : गान्धारः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ३९८ क्रमाङ्क पर सेनापति, राजा तथा जीवात्मा के पक्ष में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ परमात्मा को सम्बोधन है।

पदपाठ : पिब ।सोमम्। इन्द्र ।मन्दतु। त्वा ।यम्। ते ।सुषाव ।हर्यः ।हरि ।अश्व ।अद्रिः ।अ ।द्रिः ।सोतुः ।बाहुभ्याम् ।सुयतः ।सु ।यतः ।अर्वा॥

पदार्थ : हे (हर्यश्व) आकर्षणशक्तियुक्त हैं व्याप्त सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि लोक जिसके ऐसे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! आप (सोमम्) मेरे भक्तिरस को (पिब) पान कीजिए, स्वीकार कीजिए। वह मेरा भक्तिरस (त्वा) आपको (मन्दतु) आनन्दित करे, जिस भक्तिरस को (सोतुः) रथ प्रेरक सारथि की (बाहुभ्याम्) भुजाओं से (सुयतः) सुनियन्त्रित (अर्वा न) घोड़े के समान (सुयतः) यम-नियम आदियों से सुनियन्त्रित (अद्रिः) अविनश्वर मेरे अन्तरात्मा ने (ते) आपके लिए (सुषाव) अभिषुत किया है ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : मनुष्य का आत्मा तप और श्रद्धा के साथ वेदमन्त्रों को गा-गाकर जब परमात्मा के लिए भक्तिरस प्रवाहित करता है तब परमात्मा उसके अन्दर सद्गुणों और सत्कर्मों को प्रेरित कर उसे महान् बना देता है ॥१॥