Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/928

यस्ते मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्व हसि। स त्वामिन्द्र प्रभूवसो ममत्तु॥९२८

Veda : Samveda | Mantra No : 928

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : विराट् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा जीवात्मा को कह रहा है।

पदपाठ : यः ।ते ।मदः ।युज्य ।चारुः ।अस्ति। येन। वृत्राणि ।हर्य ।हरि ।अश्व ।हसि ।सः ।त्वाम् ।इन्द्र ।प्रभूवसो ।प्रभु ।वसो ।ममत्तु ।बोध॥

पदार्थ : (हर्यश्व) ज्ञान कर्म के आहर्ता हैं ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप घोड़े जिसके ऐसे हे जीवात्मन् ! (यः) जो (तव) तेरा (मदः) उत्साह (युज्यः) तेरा सहयोगी और (चारुः) श्रेष्ठ (अस्ति) है, (येन) जिस उत्साह से तू (वृत्राणि) बाह्य और आन्तरिक रिपुओं को (हंसि) विनष्ट करता है, (सः) वह उत्साह, हे (प्रभूवसो) बहुत गुणोंवाले (इन्द्र) जीवात्मन् ! (त्वा) तुझे (ममत्तु) आनन्दित करे ॥२॥

भावार्थ : मनुष्य का आत्मा अपनी शक्ति को पहचानकर जब जीवन-संग्राम में उतरता है तब उसकी विजय सुनिश्चित है ॥२॥