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Samveda/929

बोधा सु मे मघवन्वाचमेमां यां ते वसिष्ठो अर्चति प्रशस्तिम्। इमा ब्रह्म सधमादे जुषस्व (चा)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥९२९

Veda : Samveda | Mantra No : 929

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : विराट् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब उपासक परमात्मा को सम्बोधन करता है।

पदपाठ : बोध ।सु ।मे। मघवन् ।वाचम् ।आ ।इमाम् ।याम। ते ।वसिष्ठ ।अर्चति ।प्रशस्तिम् ।प्र ।शस्तिम् ।इमा ।ब्रह्म ।साधमादे ।सध ।मादे। जुषस्व॥

पदार्थ : हे (मघवन्) ऐश्वर्यवान् वा दानवान् परमात्मन् ! आप (मे) मेरी (इमाम्) इस (प्रशस्तिं वाचम्) आपके गुण-गान की वाणी को (सु आ बोध) भली-भाँति जानिए, (याम्) जिस वाणी को (ते) आपके लिए (वसिष्ठः अर्चति) अपने अन्दर सद्गुणों को अतिशयरूप से बसानेवाला मनुष्य उच्चारण कर रहा है—अर्थात् मैं उच्चारण कर रहा हूँ। आप (सधमादे) सामूहिक उपासना-यज्ञ में (इमा ब्रह्म) इन स्तोत्रों को (जुषस्व) स्वीकार कीजिए ॥३॥

भावार्थ : जो लोग श्रद्धा से परमात्मा की गुणावलि की प्रशंसा करते हैं, वे स्वयं भी गुणी होकर उत्कर्ष प्राप्त करते हैं ॥३॥