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Samveda/931

नेमिं नमन्ति चक्षसा मेषं विप्रा अभिस्वरे। सुदीतयो वो अद्रुहोऽपि कर्णे तरस्विनः समृक्वभिः॥९३१

Veda : Samveda | Mantra No : 931

In Hindi:

ऋषि : रेभः काश्यपः | देवता : इन्द्रः | छन्द : उपरिष्टाद्बृहती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में उपास्य-उपासक विषय का वर्णन है।

पदपाठ : नेमिम्। नमन्ति ।चक्षसा । मेषम् । विप्राः । वि । प्राः । अबिस्वरे । अभि । स्वरे । सुदीतयः ।सु ।दीतयः। वः ।अद्रुहः ।अ ।द्रुहः ।अपि ।कर्णे ।तरस्विनः ।सम्। ऋकभिः॥

पदार्थ : (विप्राः) मेधावी ब्राह्मण लोग (अभिस्वरे) वेद-स्तोत्र में (नेमिम्) रथचक्र में परिधि के समान व्याप्त, (मेषम्) सुख से सींचनेवाले इन्द्र परमेश्वर को (चक्षसा) साक्षात्कार से (नमन्ति) अपनी ओर झुका लेते हैं। आगे मनुष्यों को सम्बोधन है—हे (सुदीतयः) भली-भाँति अविद्या का क्षय करनेवाले जनो ! (वः) तुम (अद्रुहः) द्रोह न करनेवाले होवो। (अपि) साथ ही (कर्णे) अपनी और दूसरों की जीवननौका के कर्णधार होने में (तरस्विनः) वेगवान् बनो। (ऋक्वभिः) प्रशस्त स्तुतिवाले स्तोता जनों के साथ (सम्) सङ्गति करो ॥२॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिए कि परमेश्वर का साक्षात्कार करके द्रोहरहित, सबके मित्र, कर्णधार,क्रियाशील, सत्सङ्गतिपरायण और परोपकारी होकर विचरें ॥२॥