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Samveda/933

यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः। विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठं यो वृत्रहा गृणे॥९३३

Veda : Samveda | Mantra No : 933

In Hindi:

ऋषि : पुरुहन्मा आङ्गिरसः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क २७३ पर परमात्मा और राजा के विषय में व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय वर्णित है।

पदपाठ : यः ।राजा ।चर्षणीनाम् ।याता ।रथेभिः ।अध्रिगुः ।अध्रि ।गुः ।विश्वसाम् ।तरुता ।पृतनानाम् ।ज्येष्ठम् ।यः ।वृत्रहा ।हा ।गृणे॥

पदार्थ : (यः) जो मेरा आत्मा (चर्षणीनाम्) मनुष्यों में (राजा) सम्राट् है और (अध्रिगुः) किसी से न रोकी जा सकने योग्य क्रियावाला जो (रथेभिः) देहरूप रथों से (याता) यात्रा करता है और जो (विश्वासाम्) सब (पृतनानाम्) आन्तरिक वा बाह्य शुत्र-सेनाओं का (तरुता) अतिक्रमण करनेवाला है और (यः) जो वृत्रहा पाप,विघ्न आदि का विनाशक है, उस (ज्येष्ठम्) श्रेष्ठ आत्मा का मैं (गृणे) गुण-वर्णन करता हूँ ॥१॥

भावार्थ : मनुष्य के आत्मा में महान् शक्ति निहित है। उद्बोधन मिलने पर वह बड़े से बड़े कार्य कर सकता है ॥१॥