Samveda/946
अग्निं वो वृधन्तमध्वराणां पुरूतमम्। अच्छा नप्त्रे सहस्वते॥९४६
Veda : Samveda | Mantra No : 946
In English:
Seer : prayogo bhaargavaH | Devta : agniH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : agni.m vo vRRidhantamadhvaraaNaa.m puruutamam . achChaa naptre sahasvate.946
Component Words : agnim .vaH .vRRidhantam .adhvaraaNaam .purutamam .achCha .naptre .sahasvate.
In Hindi:
ऋषि : प्रयोगो भार्गवः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में २१ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ भी प्रकारान्तर से वही विषय दर्शाया जा रहा है।
पदपाठ : अग्निम् ।वः ।वृधन्तम् ।अध्वराणाम् ।पुरुतमम् ।अच्छ ।नप्त्रे ।सहस्वते॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुम (वः) तुम्हें (वृधन्तम्) बढ़ानेवाले, (अध्वराणाम्) यज्ञों के अर्थात् परोपकारार्थ किये जानेवाले कर्मों के (पुरुतमम्) अतिशय पूरक, (अग्निम्)ज्ञानप्रकाशक परमेश्वर की उपासना करो। (नप्त्रे) पतित न होने देनेवाले, अपितु उठानेवाले, (सहस्वते) बलवान् उस परमेश्वर के (अच्छ) अभिमुख होवो ॥१॥
भावार्थ : सबको चाहिए कि शुभ कर्मों में उत्साहित करनेवाले, दुष्कर्मों से निवारण करनेवाले, बलवान्, उत्कर्षकारी, बलप्रदाता परमेश्वर की नित्य उपासना करें ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रयोगो भार्गवः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके २१ क्रमाङ्के परमात्मपक्षे व्याख्याता। अत्र तस्मिन्नेव विषये प्रकारान्तरेण व्याख्यायते।
पदपाठ : अग्निम् ।वः ।वृधन्तम् ।अध्वराणाम् ।पुरुतमम् ।अच्छ ।नप्त्रे ।सहस्वते॥
पदार्थ : हे जनाः। यूयम् (वः) युष्मान् (वृधन्तम्) वर्धयन्तम्, (अध्वराणाम्) यज्ञानाम्, परोपकाराय अनुष्ठीयमानानां कर्मणाम् (पुरूतमम्) पूरयितृतमम् (अग्निम्) ज्ञानप्रकाशकं परमेश्वरम्, उपाध्वम् इति शेषः। (नप्त्रे) न पातयित्रे, प्रत्युत उत्थापयित्रे, (सहस्वते) बलवते तस्मै अग्नये परमात्मने (अच्छ) आभिमुख्यं भजत ॥१॥
भावार्थ : सर्वैः शुभकर्मसूत्साहयिता दुष्कर्मभ्यो निवारयिता बलवानुत्कर्षकरो बलप्रदः परमेश्वरो नित्यमुपासनीयः ॥१॥
टिप्पणी:१. ऋ० ८।१०२।७, साम० २१।