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Samveda/947

अयं यथा न आभुवत्त्वष्टा रूपेव तक्ष्या। अस्य क्रत्वा यशस्वतः॥९४७

Veda : Samveda | Mantra No : 947

In Hindi:

ऋषि : प्रयोगो भार्गवः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि क्यों हम परमेश्वर के अभिमुख हों।

पदपाठ : अयम् ।यथा ।नः ।आभुवत्। आ ।भुवत् ।स्पष्टा ।रूपा ।इव ।तक्ष्या ।अस्य ।क्रत्वा ।यशस्वतः॥

पदार्थ : हम परमेश्वर के अभिमुख होवें (यथा) जिससे, वह (नः) हममें, हमारे जीवनों में (आभुवत्) रम जाए, (त्वष्टा) बढ़ई (तक्ष्या रूपा इव) जैसे घड़े जानेवाले रूपों में रम जाता है। हम (यशस्वतः) यशस्वी (अस्य) इस परमेश्वर के (क्रत्वा) ज्ञान एवं कर्म से, संयुक्त होवें ॥२॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥

भावार्थ : जगदीश्वर यदि हमारे जीवनों में व्याप्त हो जाता है तो सदा ही अच्छे-बुरे के विवेक से युक्त हम पुण्य कर्मों को ही करते हुए कीर्तिशाली होते हैं ॥२॥