Samveda/950
न किष्ट्वद्रथीतरो हरी यदिन्द्र यच्छसे। न किष्ट्वानु मज्मना न किः स्वश्व आनशे॥९५०
Veda : Samveda | Mantra No : 950
In English:
Seer : gotamo raahuugaNaH | Devta : indraH | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : na kiShTvadrathiitaro harii yadindra yachChase . na kiShTvaanu majmanaa na kiH svashva aanashe.950
Component Words : na .kiH .tvat .rathiitaraH. hariiiti .yat .indra .yachChase. na. kiH .tvaa .anu .majmanaa .na .kiH .svashvaH .su .ashvaH .aanashe.
In Hindi:
ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनः जीवात्मा को सम्बोधन किया गया है।
पदपाठ : न ।किः ।त्वत् ।रथीतरः। हरीइति ।यत् ।इन्द्र ।यच्छसे। न। किः ।त्वा ।अनु ।मज्मना ।न ।किः ।स्वश्वः ।सु ।अश्वः ।आनशे॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) विघ्नों को विदीर्ण करनेवाले जीवात्मन् ! (न किः) कोई भी नहीं (त्वत्) तेरी अपेक्षा (रथीतरः) अधिक प्रशस्त रथारोही है, (यत्) क्योंकि, तू (हरी) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-रूप घोड़ों को (यच्छसे)शरीररूप रथ में नियन्त्रित किये रखता है। (न किः) कोई भी नहीं (त्वा) तेरी (मज्मना) बल में (अनु) बराबरी करता है। (न किः) कोई भी नहीं (स्वश्वः) उत्कृष्ट घोड़ोंवाला भी (आनशे) तेरे बराबर हो सकता है ॥२॥
भावार्थ : प्रोद्बोधन दिया हुआ जीवात्मा जब वीररस को अपने अन्दर सञ्चारित करता है तब कोई भी अन्य उसकी बराबरी नहीं कर सकता ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : अथ पुनर्जीवात्मा सम्बोध्यते।
पदपाठ : न ।किः ।त्वत् ।रथीतरः। हरीइति ।यत् ।इन्द्र ।यच्छसे। न। किः ।त्वा ।अनु ।मज्मना ।न ।किः ।स्वश्वः ।सु ।अश्वः ।आनशे॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) विघ्नविद्रावक जीवात्मन् ! (न किः) न कोऽपि (त्वत्) त्वदपक्षेया (रथीतरः) अतिशयेन प्रशस्तः रथारोही अस्ति, (यत्) यस्मात्, त्वम् (हरी) ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियरूपौ अश्वौ (यच्छसे) देहरथे नियन्त्रयसि। (न किः) न कश्चित् (त्वा) त्वाम् (मज्मना) बलेन। [मज्म इति बलनाम। निघं० २।९।] (अनु)अनुकरोति। (न किः) नैव कश्चित् (स्वश्वः) शोभनाश्वः अपि (आनशे) त्वां व्याप्नोति, त्वत्तुल्योऽस्तीति भावः ॥२॥२
भावार्थ : प्रोद्बोधितो जीवात्मा यदा वीररसं स्वात्मनि सञ्चारयति तदा न कोऽप्यन्यस्तत्तुल्यतां कर्त्तुमर्हति ॥२॥
टिप्पणी:१. ऋ० १।८४।६।२. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रमिमं सभाध्यक्षसेनाध्यक्षविषये व्याख्यातवान्।