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Samveda/951

इन्द्राय नूनमर्चतोक्थानि च ब्रवीतन। सुता अमत्सुरिन्दवो ज्येष्ठं नमस्यता सहः (र)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥९५१

Veda : Samveda | Mantra No : 951

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः जीवात्मा के उद्बोधन का विषय है।

पदपाठ : इन्द्राय ।नूनम् ।अर्चत ।उक्थानि। च ।ब्रवीतन ।ब्रवीत ।न। सुताः ।अमत्सुः ।इन्दवः ।ज्येष्ठम् ।नमस्यत ।सहः॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुम (इन्द्राय) अपने अन्तरात्मा की (नूनम्) अवश्य (अर्चत) स्तुति करो, (उक्थानि च) और उद्बोधनगीतों को (ब्रवीतन) उच्चारण करो। (सुताः) प्रेरित (इन्दवः) वीररस और भक्तिरस तुम्हारे अन्तरात्मा को (अमत्सुः) हर्षित और उत्साहित करें। इस आत्मा के (ज्येष्ठम्) ज्येष्ठ (सहः) बल की, तुम (नमस्यत) प्रशंसा करो ॥३॥

भावार्थ : मनुष्य के अपने अन्तरात्मा में महान् बल निहित है। उसे उद्बोधन देकर और प्रभुभक्ति से माँजकर सब कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं ॥३॥