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Samveda/981

त्व सोम परि स्रव स्वादिष्ठो अङ्गिरोभ्यः। वरिवोविद्धृतं पयः (हि)।।॥९८१

Veda : Samveda | Mantra No : 981

In Hindi:

ऋषि : जमदग्निर्भार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे फिर वही विषय है।

पदपाठ : तवम् ।सोम। परि ।स्रव ।स्वादिष्ठ ।अङ्गिरोभ्यः ।वरिवोवित् ।वरिवः ।वित् ।घृतम् ।पयः॥

पदार्थ : हे (सोम) रसागार परमेश्वर ! (स्वादिष्ठः) सबसे अधिक मधुर और (वरिवोवित्) ऐश्वर्य को प्राप्त करानेवाले (त्वम्) आप (अङ्गिरोभ्यः) प्राणायाम के अभ्यासी योगसाधकों के लिए (घृतम्) तेज और (पयः) आनन्दरस को (परि स्रव) क्षरित कीजिए ॥३॥

भावार्थ : जो लोग परमात्मा के ध्यान में मग्न हो जाते हैं, उन्हें वह सर्वाधिक रसीला, सर्वाधिक मधुर और सर्वाधिक तेजस्वी अनुभूत होता है ॥३॥इस खण्ड में परमात्मा के स्वरूपवर्णनपूर्वक उसकी स्तुति करने, उसका आह्वान करने और उससे आनन्दरस के प्रवाह की प्रार्थना करने के कारण इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥षष्ठ अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥