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Samveda/982

तव श्रियो वकष्यस्येव विद्युतोऽग्नेश्चिकित्र उषसामिवेतयः। यदोषधीरभिसृष्टो वनानि च परि स्वयं चिनुषे अन्नमासनि॥९८२

Veda : Samveda | Mantra No : 982

In Hindi:

ऋषि : अरुणो वैतहव्यः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : प्रथम मन्त्र में भौतिक अग्नि के वर्णन द्वारा परमात्मा की महिमा का प्रकाशन है।

पदपाठ : तव ।श्रियः ।वर्ष्यस्य। इव ।विद्युतः। वि ।द्युतः ।अग्नेः ।चिकित्रे ।उषसाम् ।इव ।एतयः ।आ ।इतयः ।यत् ।ओषधी ।ओष ।धीः ।अभिसृष्टः ।अभि ।सृष्टः ।वनानि ।च ।परि। स्वयम्। चिनुषे ।अन्नम्। आसनि॥

पदार्थ : हे (अग्ने) भौतिक अग्नि ! (तव) तेरी (श्रियः) शोभाएँ (वर्ष्यस्य) बरसाऊ मेघ की (विद्युतः इव) बिजलियों के समान और (उषसाम्) उषाओं के (इतयः इव) आगमनों के समान (आ चिकित्रे) ज्ञात होती हैं, (यत्) जब (ओषधीः) ओषधियों को (वनानि च) और जंगलों को (अभि) लक्ष्य करके (सृष्टः) प्रज्वलित हुआ तू (स्वयम्) अपने आप (आसनि) अपने ज्वालारूप मुख में (अन्नम्) खाद्य को (परि चिनुषे) चारों ओर से संगृहीत करता है ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जगदीश्वर की ही यह प्रशस्ति है कि उसने भयंकर ज्वालाओं से जटिल उस देदीप्यमान अग्नि को उत्पन्न किया है, जो जंगलों को भस्म करके नवीन वनस्पतियों को अङ्कुरित करने में सहायक होता है ॥१॥