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Samveda/984

मेधाकारं विदथस्य प्रसाधनमग्निहोतारं परिभूतरं मतिम्। त्वामर्भस्य हविषः समानमित्वां महो वृणते नान्यं त्वत् (वु)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥९८४

Veda : Samveda | Mantra No : 984

In Hindi:

ऋषि : अरुणो वैतहव्यः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : इस प्रकार भौतिक अग्नि के वर्णन द्वारा परमात्मा की महिमा प्रकाशित करके अब अग्नि नाम से जगदीश्वर की स्तुति करते हैं।

पदपाठ : मेधाकारम् ।मेधा ।कारम् ।विदथस्य ।प्रसाधनम् ।प्र ।साधनम्। अग्निम्। होतारम्। परिभूतम् ।परि ।भूतरम् ।मतिम्। त्वाम् ।अर्भस्य ।हविषः ।समानम् ।सम। आनम्। इत ।त्वाम् ।महः ।वृणते ।न ।अन्यम्। अन्। यम्। त्वत्॥

पदार्थ : (मेधाकारम्) धारणावती बुद्धि के प्रदाता, (विदथस्य) ब्रह्माण्ड-यज्ञ के वा मनुष्यों के जीवनयज्ञ के (प्रसाधनम्) सिद्ध करनेवाले, (होतारम्) सुख आदि के दाता, (परिभूतरम्) अतिशय रूप से विघ्नों को दूर करनेवाले, (मतिम्) सर्वज्ञ (त्वाम् अग्निम्) तुझ अग्रनायक को (समानम् इत्) समानरूप से (अर्भस्य हविषः) छोटे त्याग के लिए और (त्वाम्) तुझे ही (महः) महान् त्याग के लिए, लोग (वृणते) चुनते हैं, अर्थात् आदर्शरूप से अपने सम्मुख स्थापित करते हैं, (त्वत् अन्यम्) तुझसे भिन्न को (न) नहीं ॥३॥यहाँ विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार है। ‘तारम्’ ‘तरम्’ में छेकानुप्रास है ॥३॥

भावार्थ : त्याग और परोपकार के लिए परमेश्वर को ही आदर्शरूप में सबको अपने सम्मुख रखना चाहिए और उसके पीछे चलकर स्वयं भी त्याग एवं परोपकार करना चाहिए ॥३॥