Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/983

वातोपजूत इषितो वशाअनु तृषु यदन्ना वेविषद्वितिष्ठसे। आ ते यतन्ते रथ्योऽ.यथा पृथक्शर्धास्यग्ने अजरस्य धक्षतः॥९८३

Veda : Samveda | Mantra No : 983

In Hindi:

ऋषि : अरुणो वैतहव्यः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में फिर वही विषय है।

पदपाठ : वातोपजूतः ।वात ।उपजूतः। इषितः ।वशान् ।अनु ।त्रिषु। यत् ।अन्ना ।वेविषत्। वितिष्ठसे। वि ।तिष्ठसे ।आ ।ते ।यतन्ते ।रथ्यः ।यथा ।पृथक ।शर्धासि ।अग्ने ।अजरस्य ।अ। जरस्य। धक्षतः॥

पदार्थ : हे (अग्ने) भौतिक अग्नि ! (वातोपजूतः) वायु से कम्पित किया हुआ, (वशान् अनु) अभीष्ट वनस्पतियों को लक्ष्य करके (इषितः) प्रेरित हुआ तू (तृषु) तुरन्त (यत्) जब (अन्ना) अन्नों अर्थात् भक्ष्य वनस्पति आदियों में (वेविषत्) व्याप्त होता हुआ (वितिष्ठसे) इधर-उधर चञ्चल होता है, तब (अजरस्य) जीर्ण न होते हुए तथा (धक्षतः) जलाते हुए (ते) तुझ अग्नि के (शर्धांसि) ज्वालारूपी तेज (रथ्यः यथा) रथारोही योद्धाओं के समान (पृथक्) पृथक्-पृथक् दिशाओं में (आयतन्ते) उठते हैं ॥२॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥

भावार्थ : जैसे रथारोही योद्धा लोग संग्राम में पृथक्-पृथक् विभिन्न दिशाओं में शत्रुओं पर प्रहार करते हैं, वैसे ही जंगलों को भस्म करने के लिए उद्यत अग्नि-ज्वालाएँ पृथक्-पृथक् विभिन्न दिशाओं में जलाने का कार्य करती हैं ॥२॥