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Samveda/1005

स्वादोरित्था विषूवतो (मध्वः पिबन्ति गौर्यः। या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभसे वस्वीरनु स्वराज्यम्)*॥१००५

Veda : Samveda | Mantra No : 1005

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्रः | छन्द : पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ४०९ क्रमाङ्क पर आत्मिक तथा राष्ट्रिय स्वराज्य के विषय में व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ सूर्य के स्वराज्य का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : स्वादोः ।इत्था। विषूवतः। वि ।सूषतः ।मधोः ।पिबन्ति। गौर्यः ।याः ।इन्द्रेण ।सयावरीह ।स ।यावरी ।वृष्णा ।मदन्ति ।शोभया ।वस्वी ।अनु ।स्वराज्यम्॥

पदार्थ : (गौर्यः) चमकीली सूर्यकिरणें (इत्था) सचमुच (वि-सुवतः) विशेषरूप से भूमि पर बरसते हुए बादल के (स्वादोः) स्वादु (मधोः) मधुर जल का (पिबन्ति) पान करती हैं, (याः) जो सूर्यकिरणें (वृष्णा) वर्षा करनेवाले (इन्द्रेण) सूर्य की (सयावरीः) सहगामिनी होती हुई (शोभथा) शोभन प्रकार से (मदन्ति) आनन्दित करती हैं। (वस्वीः) निवासक वे किरणें (स्वराज्यम्) सूर्य के स्वराज्य के (अनु) अनुकूल चलती हैं ॥१॥

भावार्थ : अहो, सूर्य का स्वराज्य कैसा दर्शनीय है ! किस प्रकार सूर्य-किरणें निर्बाध होकर मेघ से बरसाये हुए नदी, नद, समुद्र आदि में व्याप्त जल को पीकर, पुनः बादल बनाकर फिर मेघ-जल को भूमि पर बरसा देती हैं। वैसे ही हमें भी चाहिए कि हम भी आन्तरिक स्वराज्य तथा अपने राष्ट्र के स्वराज्य की अर्चना करें ॥१॥