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Samveda/1006

ता अस्य पृशनायुवः सोम श्रीणन्ति पृश्नयः। प्रिया इन्द्रस्य धेनवो वज्र हिन्वन्ति सायकं वस्वीरनु स्वराज्यम्॥१००६

Veda : Samveda | Mantra No : 1006

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्रः | छन्द : पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : ताः ।अस्य ।पृशनायुवः ।सोमम्। श्रीणान्ति ।पृश्नयः ।प्रियाः ।इन्द्रस्य ।धेनवः ।वज्रम् ।हिन्वन्ति ।सायकम् ।वस्वीः। अनु ।स्वराज्यम् ।स्व ।राज्यम्॥

पदार्थ : (अस्य) इस इन्द्र नामक सूर्य की (ताः पृश्नयः) वे रङ्ग-बिरङ्गी किरणें (पृशनायुवः) मानो चन्द्रमा के साथ स्पर्श को चाहती हुई (सोमम्) चन्द्रमा को (श्रीणन्ति) प्रकाश से परिपक्व करती हैं। (इन्द्रस्य) सूर्य की, वे (प्रियाः) प्रिय (धेनवः) किरणें (सायकम्) दुर्भिक्ष आदि का अन्त करनेवाले (वज्रम्) मेघ के विद्युत् रूप वज्र को (हिन्वन्ति) प्रेरित करती हैं। इस प्रकार (वस्वीः) वे निवासक किरणें (स्वराज्यम्) सूर्य के स्वराज्य के (अनु) अनुकूल चलती हैं ॥२॥ यहाँ ‘पृशनायुवः’ में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा अलङ्कार है ॥२॥

भावार्थ : सूर्य-किरणों का ही यह महान् कार्य है कि वे सूर्य के स्वराज्य का अनुसरण करती हुई चन्द्र आदि लोकों को प्रकाशित करती हैं, मेघों में विद्युत् रूप वज्र को गरजाती हुई वर्षा करती हैं और सबको बसाती हैं। उसी प्रकार मनुष्यों को भी अपना आन्तरिक एवं बाह्य स्वराज्य प्रकाशित करना चाहिए ॥२॥