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Samveda/1014

उप त्रितस्य पाष्योऽभक्त यद्गुहा पदम्। यज्ञस्य सप्त धामभिरध प्रियम्॥१०१४

Veda : Samveda | Mantra No : 1014

In Hindi:

ऋषि : त्रित आप्तयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा का विषय है।

पदपाठ : उप ।त्रितस्य ।पाष्यो ।अभक्त ।यत् ।गुहा ।पदम् ।यज्ञस्य। सप्त ।धामभिः ।अध। प्रियम्॥

पदार्थ : (यत्) क्योंकि, वह पवमान सोम अर्थात् सर्वान्तर्यामी जगत्स्रष्टा परमेश्वर (पाष्योः) द्यावापृथिवी की (गुहा) गुफाओं में भी (त्रितस्य) पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ रूप तीन स्थानों में स्थित सूर्य के (पदम्) किरण-समूह को (उप अभक्त) पहुँचाता है, (अध) इस कारण (यज्ञस्य) शरीर में सङ्गत जीवात्मा के (सप्त धामभिः) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इन सात धामों से (प्रियम्) उस प्रिय परमेश्वर की पूजा करो ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा की कैसी अद्भुत व्यवस्था है कि सूर्य की किरणें विभिन्न लोकों के भूगर्भ में भी पहुँचकर वहाँ अपने ताप से सुवर्ण आदि धातुओं को उत्पन्न कर देती हैं ॥२॥