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Samveda/1040

महान्तं त्वा महीरन्वापो अर्षन्ति सिन्धवः। यद्गोभिर्वासयिष्यसे॥१०४०

Veda : Samveda | Mantra No : 1040

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब परमात्मा की महिमा वर्णित करते हैं।

पदपाठ : महान्तम् ।त्वा ।महीः ।अनु ।आपः ।अर्षन्ति ।सिन्धवः।यत् ।गोभिः ।वासयिष्यसे॥

पदार्थ : हे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! (महान्तम्) अतिशय महान् (त्वा अनु) आपके आदेशानुसार (महीः) विशाल, (सिन्धवः) प्रवाहमयी (आपः) नदियाँ (अर्षन्ति) गति करती हैं, (यत्) क्योंकि, आप (गोभिः) सूर्यकिरणों से (वासयिष्यसे) वर्षा द्वारा उन्हें बसाये रखोगे ॥४॥

भावार्थ : नदी आदि सब पदार्थ परमात्मा के निर्धारित नियमों के अनुसार ही चलते हैं, क्योंकि वह जगत् का सम्राट् है ॥४॥