Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1041

समुद्रो अप्सु मामृजे विष्टम्भो धरुणो दिवः। सोमः पवित्रे अस्मयुः॥१०४१

Veda : Samveda | Mantra No : 1041

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा का शुद्धिकार्य वर्णित है।

पदपाठ : समुद्रः ।सम। उद्रः। अप्सु ।मासृजे ।विष्टम्भः ।वि। स्तम्भः ।धरुणाः। दिवः ।सोमः ।पवित्रे ।अस्मयुः॥

पदार्थ : (समुद्रः) आनन्द-रसों को उमड़ानेवाला, (विष्टम्भः) सबको सहारा देनेवाला, (दिवः) सूर्य को (धरुणः) थामनेवाला, (अस्मयुः) हमसे प्रीति करनेवाला (सोमः) जगत्स्रष्टा परमेश्वर (पवित्रे) वायु में और (अप्सु) जलों में (मामृजे) नित्य शुद्धि करता रहता है ॥५॥

भावार्थ : यदि जल, वायु आदि प्राकृतिक पदार्थों को सूर्य द्वारा प्रतिदिन जगदीश्वर शुद्ध न करता रहता तो मलों के पुञ्ज होकर वे किसी के उपयोग के योग्य भी न रहते ॥५॥