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Samveda/1066

शकेम त्वा समिध साधया धियस्त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्। त्वमादित्या आ वह तान्ह्यूऽ.श्मस्यग्ने सख्ये मा रिषामावयं तव (छौ)।।॥१०६६

Veda : Samveda | Mantra No : 1066

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : आगे फिर आचार्य और शिष्य का ही विषय कहा गया है।

पदपाठ : शकेम ।त्वा ।समिधम् ।सम्। इधम्। साधय ।धियः। त्वेइति ।देवाः ।हविः ।अदन्ति ।आहुतम् ।आ ।हुतम्। त्वम् ।आदित्यान् ।आ। दित्यान ।आ ।वह ।तान् ।हि ।उश्मसि ।अग्ने ।सख्ये ।स ।ख्ये ।मा ।रिषाम ।वयम् ।तव॥

पदार्थ : हे आचार्यप्रवर ! हम शिष्य (त्वा) आपको (समिधं शकेम) ज्ञान-दानार्थ प्रदीप्त कर सकें। आप (धियः) हमारी बुद्धियों को (साधय) परिष्कृत करो। (त्वे) आपसे (आहुतम्) दिये गये (हविः) ग्राह्य ज्ञान को (देवाः) प्रमुदित शिष्य (अदन्ति) ग्रहण करते हैं। आप (आदित्यान्) आदित्य ब्रह्मचारी (आवह) समाज को प्राप्त कराओ, (तान् हि) उन्हें हम (अश्मसि) चाह रहे हैं। हे (अग्ने) विद्वन्, शिक्षणकला के ज्ञाता आचार्य ! (वयम्) हम शिष्य (तव सख्ये) आपके साहचर्य में (मा रिषाम) कभी दोषयुक्त वा क्षतिग्रस्त न हों ॥३॥

भावार्थ : शिष्यों की समर्पण-रूप समिधा से जब आचार्य प्रदीप्त हो जाता है, तभी वह शिष्यों के साथ अन्तरङ्गता स्थापित करके अपनी कमायी हुई सब विद्या उन्हें दे देता है और उनका चारित्रिक विकास भी करता है ॥३॥इस खण्ड में जीवात्मा के उद्बोधनपूर्वक परमात्मा, जीवात्मा, ब्रह्मानन्द एवं मोक्षप्राप्ति का वर्णन, आचार्य-शिष्य विषय का वर्णन और प्रसङ्गतः राजा के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥सप्तम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥