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Samveda/1070

भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः। वसु स्पार्हं तदा भर॥१०७०

Veda : Samveda | Mantra No : 1070

In Hindi:

ऋषि : त्रिशोकः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १३४ क्रमाङ्क पर परमात्मा, राजा और आचार्य को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन दे रहे हैं।

पदपाठ : भिन्धि ।विश्वाः ।अप। द्विषः। परि ।बाधः ।जहि ।मृधः ।वसु ।स्पार्हम् ।तत् ।आ ।भर॥

पदार्थ : हे इन्द्र अर्थात् मेरे वीर अन्तरात्मन् ! तू (विश्वाः द्विषः) सब द्वेष करनेवाली शत्रु-सेनाओं को (अपभिन्धि) चीर दे, (बाधः) बाधा डालनेवाले (मृधः) हिंसकों को (परि जहि) चारों ओर नष्ट कर दे। जो (स्पाहर्म्) चाहने योग्य (वसु) दिव्य तथा भौतिक धन है, (तत्) उसका (आ भर) उपार्जन कर ॥१॥यहाँ एक कर्ता कारक के साथ अनेक क्रियाओं का योग होने से दीपक अलङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : मनुष्य का अन्तरात्मा यदि प्रबुद्ध है, तो वह सब कुछ सिद्ध कर सकता है ॥१॥