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Samveda/1071

यस्य ते विश्वमानुषग्भूरेर्दत्तस्य वेदति। वसु स्पार्हं तदा भर॥१०७१

Veda : Samveda | Mantra No : 1071

In Hindi:

ऋषि : त्रिशोकः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : यस्य ।ते ।विश्वम् ।अनुषक् ।अनु ।सक ।भूरेः ।दत्तस्य ।वेदति ।वसु ।स्पार्हम् ।तत् ।आ ।भर॥

पदार्थ : हे इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्यशाली परमात्मन् ! (यस्य ते) जिस तेरे (भूरेः) बहुत अधिक (दत्तस्य) दिये हुए धन के विषय में (विश्वम्) सारा संसार (आनुषक्) निरन्तर (वेदति) जानता है, (तत्) उस (स्पार्हम्) चाहने योग्य (वसु) आध्यात्मिक तथा भौतिक धन को (आ भर) हमें भी प्रदान कर ॥३॥

भावार्थ : ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी धन बिखरा पड़ा है, वह सब परमात्मा का दिया हुआ ही है। हम भी अपने पुरुषार्थ से उस धन के भागी बनें ॥२॥