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Samveda/1079

मृज्यमानः सुहस्त्य समुद्रे वाचमिन्वसि। रयिं पिशङ्गं बहुलं पुरुस्पृहं पवमानाभ्यर्षसि॥१०७९

Veda : Samveda | Mantra No : 1079

In Hindi:

ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५१७ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ भी वही विषय प्रकारान्तर से वर्णित किया जा रहा है।

पदपाठ : मृज्यमानः ।सुहस्त्य। सु। हस्त्य। समुद्रे ।सम् ।उद्रे ।वाचम् ।इन्वसि ।रयिम् ।पिशङ्गम् ।बहुलम् ।पुरुस्पृहम् ।पुरु ।स्पृहम् ।पवमान ।अभि ।अर्षसि ॥

पदार्थ : हे (सुहस्त्य) उत्कृष्ट हस्तकला में कुशल जगदीश्वर ! (मृज्यमानः) श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभावों से अलङ्कृत होते हुए आप (समुद्रे) अन्तरिक्ष में (वाचम्) विद्युद्गर्जना के शब्द को (इन्वसि) प्रेरित करते हो और हे (पवमान) सर्वान्तर्यामिन् ! आप (बहुलम्) प्रचुर, (पुरुस्पृह्म्) बहुत चाहने योग्य (पिशङ्गं रयिम्) पीले वर्ण के धन सुवर्ण आदि को (अभि) हमारी ओर (अर्षसि) भेजते हो ॥१॥

भावार्थ : अन्तरिक्ष में बादलों का निर्माण, वर्षाकर्म आदि और विना ही शुल्क लिये बहूमूल्य धन आदि को उत्पन्न करना परमेश्वर का ही कर्म है ॥१॥