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Samveda/1080

पुनानो वारे पवमानो अव्यये वृषो अचिक्रदद्वने। देवानासोम पवमान निष्कृतं गोभिरञ्जानो अर्षसि (ति)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१०८०

Veda : Samveda | Mantra No : 1080

In Hindi:

ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा के कर्मों का वर्णन है।

पदपाठ : पुनानः ।वारे ।पवमानः ।अव्यये ।वृषा ।उ ।अचिक्रदत् ।वने। देवानाम् ।सोम ।पवमान ।निष्कृतम् ।निः ।कृतम्। गोभिः ।अञ्जानः। अर्षसि॥

पदार्थ : (वारे) वरणीय (अव्यये) पार्थिवलोक में (पवमानः) पहुँचता हुआ और (पुनानः) पवित्रता करता हुआ (वृषा उ) सुख आदि की वर्षा करनेवाला परमात्मा (वने) मेघजल में (अचिक्रदत्) विघुद्गर्जना कराता है। हे (पवमान) पवित्रतादायक (सोम) जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! आप (देवानाम्) दिव्य अग्नि, जल, वायु आदि के (निष्कृतम्) घर अर्थात् भूलोक को (गोभिः) सूर्यकिरणों से (अञ्जानः) प्रकाशित करते हुए (अर्षसि) कर्मण्य बने हुए हो ॥२॥

भावार्थ : अन्तरिक्ष में बादल गर्जाना, वर्षा द्वारा भूलोक को पवित्र करना, सूर्यकिरणों द्वारा भूमण्डल को प्रकाशित करना इत्यादि सब कर्म जगत्पति परमेश्वर ही करता है, अन्य कोई नहीं ॥२॥