Samveda/1090
उभे यदिन्द्र रोदसी आपप्राथोषा इव। महान्तं त्वा महीना सम्राजं चर्षणीनाम्। देवी जनित्र्यजीजनद्भद्रा जनित्र्यजीजनत्॥१०९०
Veda : Samveda | Mantra No : 1090
In English:
Seer : maandhaataa yauvanaashvaH | Devta : indraH | Metre : mahaa pa.mktiH | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ubhe yadindra rodasii aapapraathoShaa iva . mahaanta.m tvaa mahiinaa.m samraaja.m charShaNiinaam . devii janitryajiijanadbhadraa janitryajiijanat.1090
Component Words : ubhe .iti .yat .indra .rodasii .iti .aapapraatha .aa .papraatha .uShaa .iva .mahaantam .tvaa .mahiinaam .samraajam .sam .raajam .charShaNiinaam .devii .janitrii .ajiijanat .bhadraa .janitrii .ajijanat.
In Hindi:
ऋषि : मान्धाता यौवनाश्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : महा पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ३७९ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में व्याख्या हो चुकी है। यहाँ वीर मानव को उद्बोधन दिया जा रहा है।
पदपाठ : उभे ।इति ।यत् ।इन्द्र ।रोदसी ।इति ।आपप्राथ ।आ ।पप्राथ ।उषा ।इव ।महान्तम् ।त्वा ।महीनाम् ।सम्राजम् ।सम् ।राजम् ।चर्षणीनाम् ।देवी ।जनित्री ।अजीजनत् ।भद्रा ।जनित्री ।अजिजनत्॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) वीर मानव ! (यत्) जो तूने (उषाः इव) उषा के समान (उभे रोदसी) आकाश-पृथिवी दोनों को (आ पप्राथ) अपने यश से पूर्ण किया हुआ है, ऐसे (महीनां महान्तम्) महानों में महान् (चर्षणीनां सम्राजम्) मनुष्यों के सम्राट् (त्वा) तुझे (देवी जनित्री) दिव्यगुणमयी माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है, (भद्रा जनित्री) श्रेष्ठ माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार और वीररस है ॥१॥
भावार्थ : मनुष्य अपनी महिमा को पहचानकर बड़े-बड़े कार्य कर सकता है ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : मान्धाता यौवनाश्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : महा पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके ३७९ क्रमाङ्के परमात्मनृपत्योर्विषये व्याख्याता। अत्र वीरो मानव उद्बोध्यते।
पदपाठ : उभे ।इति ।यत् ।इन्द्र ।रोदसी ।इति ।आपप्राथ ।आ ।पप्राथ ।उषा ।इव ।महान्तम् ।त्वा ।महीनाम् ।सम्राजम् ।सम् ।राजम् ।चर्षणीनाम् ।देवी ।जनित्री ।अजीजनत् ।भद्रा ।जनित्री ।अजिजनत्॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) वीर मानव ! (यत्) यत्, त्वम् (उषाः इव) प्रभातकान्तिरिव (उभे रोदसी) उभे द्यावापृथिव्यौ (आ पप्राथ) स्वयशसा पूरितवानसि, तादृशम् (महीनां महान्तम्) महत्त्ववतामपि महत्त्ववन्तम्, (चर्षणीनां सम्राजम्) मनुष्याणाम् अधिराजं च (त्वा) त्वाम् (देवी जनित्री) दिव्यगुणयुक्ता माता (अजीजनत्) अजनयत्, (भद्रा जनित्री) श्रेष्ठा माता (अजीजनत्) अजनयत् ॥१॥अत्रोपमालङ्कारः, वीरो रसः ॥१॥
भावार्थ : मनुष्यः स्वमहिमानं परिचित्य महान्ति कर्माणि कर्तुं शक्नोति ॥१॥
टिप्पणी:१. ऋ० १०।१३४।१, साम० ३७९।