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Samveda/1091

दीर्घ ह्यङ्कुशं यथा शक्तिं बिभर्षि मन्तुमः। पूर्वेण मघवन्पदा वयामजो यथा यमः। देवी जनित्र्यजीजनद्भद्रा जनित्र्यजीजनत्॥१०९१

Veda : Samveda | Mantra No : 1091

In Hindi:

ऋषि : मान्धाता यौवनाश्वः-पूर्वाधः, गोधा ऋषिका-उत्तरार्धः | देवता : इन्द्रः | छन्द : महा पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : आगे फिर वीर मानव को सम्बोधन किया गया है।

पदपाठ : दीर्घम्। हि ।अङ्कुशम् ।यथा। शक्तिम्। विभर्षि। मन्तुमः ।पूर्वेण ।मघवन् ।पदा ।वयाम् ।अजः ।यथा ।यमः ।देवी ।जनित्री ।अजीजनत्। भद्रा ।जनित्री ।अजीजनत्॥

पदार्थ : हे (मन्तुमः) ज्ञानी वीर मानव ! तू (दीर्घं हि अंकुशं यथा) लम्बे अंकुश के समान (शक्तिम्) शक्ति को (बिभर्षि) धारण किये हुए है। हे (मघवन्) धन के धनी ! (पूर्वेण पदा) अगले पैर से (अजः) बकरा (वयां यथा) जैसे शाखा को पकड़ता है, वैसे तू शत्रुओं को (यमः) पकड़। तुझे (देवी जनित्री) दिव्यगुणमयी जगन्माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है, (भद्रा जनित्री) श्रेष्ठ मानवी माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है ॥२॥यहाँ उपमालङ्कार है। दो उपमाओं की संसृष्टि है ॥२॥

भावार्थ : हे मानव ! तू अपनी माता का नाम कलङ्कित मत करना। तू अपनी अद्वितीय शक्ति को पहचान। मित्रों से सौहार्द और शत्रुओं से संघर्ष करके समराङ्गण में विजय पा ॥२॥