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Samveda/1093

परि स्वानो गिरिष्ठाः पवित्रे सोमो अक्षरत्। मदेषु सर्वधा असि॥१०९३

Veda : Samveda | Mantra No : 1093

In Hindi:

ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ४७५ क्रमाङ्क पर आनन्दरसप्रवाह के विषय में व्याख्या हो चुकी है। यहाँ गुरु-शिष्य का विषय वर्णित है।

पदपाठ : परि ।स्वानः ।गिरिष्ठाः ।गिरि ।स्थाः। पवित्रे ।सोमः ।अक्षरत् ।मदेषु ।सर्वधाः ।सर्व ।धाः ।असि ॥

पदार्थ : (गिरिष्ठाः) पर्वत के समीपस्थ गुरुकुल में स्थित, (सोमः) ज्ञानरस का भण्डार आचार्य (स्वानः) ज्ञानरस को प्रेरित करता हुआ (पवित्रे) शिष्यों के पवित्र आत्मा में (परि अक्षरत्) ज्ञानरस को सींचता है। हे आचार्यवर ! (त्वम्) आप (मदेषु) प्रदान किये हुए आनन्दों में (सर्वधाः) सब शिष्यों को धारण करनेवाले (असि) होते हो ॥१॥

भावार्थ : आचार्य शिष्य को जो ज्ञान और ब्रह्मानन्द प्रदान करता है, उसकी तुलना संसार में नहीं है ॥१॥