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Samveda/1092

अव स्म दुर्हृणायतो मर्त्तस्य तनुहि स्थिरम्। अधस्पदं तमीं कृधि यो अस्मा अभिदासति। देवी जनित्र्यजीजनद्भद्रा जनित्र्यजीजनत् (यौ)।।॥१०९२

Veda : Samveda | Mantra No : 1092

In Hindi:

ऋषि : मान्धाता यौवनाश्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : महा पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः वही विषय है।

पदपाठ : अव ।स्म ।दुर्हृणायतः। दुः ।हृणायतः ।मर्त्तस्य ।तनुहि। स्थिरम् ।अधस्पदम्। अधः ।पदम् ।तम् ।ईम् ।कृधि ।यः ।अस्मान् ।अभिदासति ।अभि। दासति ।देवी ।जनित्री। अजिजनत् ।भद्रा ।जनित्री ।अजिजनत्॥

पदार्थ : हे वीर मानव ! तू (दुर्हृणायतः मर्तस्य) दुःखप्रद मार करनेवाले दुष्ट मनुष्य के (स्थिरम्) दृढ़ बल को (अव तनुहि स्म) नीचा कर दे। (तम् ईम्) उसे (अधस्पदं कृधि) पादाक्रान्त कर दे (यः) जो शत्रु (अस्मान्) हम वीरों को (अभिदासति) दास बनाने का यत्न करता है। तुझे (देवी जनित्री) दिव्यगुणमयी जगन्माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है, (भद्रा जनित्री) श्रेष्ठ मानवी माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है ॥३॥

भावार्थ : हे मानव ! गहरी नींद छोड़कर जाग उठ। तू दिव्य जननी का पुत्र है, भद्र जननी का पुत्र है। जो तुझे दास बनाना चाहता है, उसके मनसूबे को अपनी वीरता से विफल कर दे। संसार में सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त कर ॥३॥इस खण्ड में योग, परमात्मा, वीरोद्बोधन तथा राजा, आचार्य, योगी एवं शिल्पकार का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥सप्तम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥