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Samveda/1098

तं वः सखायो मदाय पुनानमभि गायत। शिशुं न हव्यैः स्वदयन्त गूर्तिभिः॥१०९८

Veda : Samveda | Mantra No : 1098

In Hindi:

ऋषि : पर्वतनारदौ काण्वौ | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५६९ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात हुई थी। यहाँ भी प्रकारान्तर से उसी विषय का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : तम् ।वः ।सखायः। स ।खायः ।मदाय। पुनानम् ।अभि ।गायत् ।शिशुम्। न। हव्यैः ।स्वदयन्त ।गूर्तिभिः॥

पदार्थ : हे (सखायः) साथियो ! (वः मदाय) अपनी आनन्दप्राप्ति एवं उत्साहप्राप्ति के लिए, तुम (तम्) उस प्रसिद्ध (पुनानम्) पवित्र करनेवाले जगत्पति सोम परमेश्वर को (अभि) लक्ष्य करके (गायत) स्तुतिगीत गाओ। अन्य लोग भी उसे (गूर्तिभिः) अपने पुरुषार्थों से (स्वदयन्त) प्रसन्न किया करें, (शिशुं न) जैसे शिशुरूप यज्ञाग्नि को (हव्यैः) हवियों से तृप्त किया जाता है ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जैसे यज्ञाग्नि हवियों से जागता है, वैसे परमात्मा मनुष्य के पुरुषार्थों से प्रसन्न होता है। सबको चाहिए कि उसके स्तुतिगीत गाते हुए अपने जीवन को उन्नत करें ॥१॥