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Samveda/1097

यस्य त इन्द्रः पिबाद्यस्य मरुतो यस्य वार्यमणा भगः। आ येन मित्रावरुणा करामह एन्द्रमवसे महे (ली)।।॥१०९७

Veda : Samveda | Mantra No : 1097

In Hindi:

ऋषि : शक्तिर्वासिष्ठः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : सतोबृहती | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः परमेश्वर की महिमा वर्णित है।

पदपाठ : यस्य ।ते ।इन्द्रः ।पिबात् ।यस्य ।मरुतः ।यस्य ।वा ।अर्यमणा ।भगः ।आ ।येन ।मित्रा ।मि ।त्रा। वरुणा ।करामहे ।इन्द्रम् ।आ ।इन्द्रम्। अवसे ।महे॥

पदार्थ : (यस्य ते) जिस जगत्स्रष्टा तुझ जगदीश्वर के उत्पन्न किये रस को (इन्द्रः) सूर्य (पिबात्) पीता है, (यस्य) जिस तेरे उत्पन्न किये रस को (मरुतः) पवन पीते हैं, (यस्य वा) और जिस तेरे उत्पन्न किये रस को (अर्यमणा) शत्रु का नियमन करनेवाले बुद्धितत्त्व के साथ (भगः) मन पीता है, (येन) जिस तुझ सर्वान्तर्यामी और सर्वप्रेरक परमेश्वर की सहायता से, हम (मित्रावरुणा) प्राण-अपान को (आ करामहे) अपने अनुकूल करते हैं और जिस तेरी सहायता से (महे अवसे) महान् रक्षा के लिए (इन्द्रम्) जीवात्मा को (आ करामहे) अनुकूल करते हैं। (सः) वह तू सोम परमेश्वर (सुनुषे) सब भौतिक रसों को वा दिव्य आनन्दरस को अभिषुत करता है। [यहाँ ‘स सुन्वे’ इसका परिवर्तित रूप ‘स सुनुषे’ पूर्वमन्त्र से लाया गया है।] ॥२॥

भावार्थ : परमेश्वर के ही रस और शक्ति से सब शरीरस्थ मन, बुद्धि, प्राण आदि और बाह्य सूर्य, चाँद, तारे, बादल, पहाड़, समुद्र, धरती-आकाश आदि रसवान् और शक्तिमान् दिखायी देते हैं ॥२॥