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Samveda/1100

अयं दक्षाय साधनोऽयमदेषु सर्वधा असि शर्धाय वीतये। अयं देवेभ्यो मधुमत्तरः सुतः (यि) [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥११००

Veda : Samveda | Mantra No : 1100

In Hindi:

ऋषि : पर्वतनारदौ काण्वौ | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा मनुष्यों का क्या उपकार करता है, यह कहते हैं।

पदपाठ : अयम् ।दक्षाव।साधनः ।अयम् ।शर्द्धाय ।वीतये ।अयम् ।देवेभ्यः।मधुमत्तरः ।सुतः॥

पदार्थ : (साधनः) सिद्धिप्रदाता (अयम्) यह पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता परमेश्वर (दक्षाय) आत्मबल के लिए होता है। (अयम्) यह परमेश्वर (शर्धाय) उत्साह देने के लिए और (वीतये) लोगों की प्रगति के लिए होता है। (सुतः) ध्यान किया गया (अयम्) यह (देवेभ्यः) विद्वान् सदाचारी उपासकों के लिए (मधुमत्तरः) अतिशय मधुर होता है ॥३॥

भावार्थ : श्रद्धा से उपासना किया गया परमेश्वर उपासक को आत्मबल, उत्साह, प्रगति तथा वाणी, कर्म एवं व्यवहार में मधुरता प्रदान करता है ॥३॥